
रामानंद सागर की “गीत” एक ऐसी फिल्म है जिसमें अगर आपने ध्यान न दिया तो लगता है, “अरे वाह, कितना मीठा संगीत!” लेकिन ध्यान दो, तो एहसास होता है कि संगीत के पीछे एक गहरी साजिश चल रही है। इसमें राजेन्द्र कुमार हैं – एक भोले-भाले चरवाहे बने हुए, माला सिन्हा हैं – मंच पर चमकती अदाकारा, और फिर आते हैं सुजीत कुमार – एक ऐसा कुँवर जो प्यार में बर्बाद नहीं, क्रिमिनल बन जाता है।
म्यूजिकल लव स्टोरी जिसमें खून, धोखा और जुर्म भी है
कमला, यानी माला सिन्हा, दिल्ली की एक थिएटर स्टार हैं। छुट्टियों में कुल्लू जाती हैं, जहां एक पहाड़ी गायक सरजू की बाँसुरी से उनका दिल बजने लगता है।
लेकिन अरे भाई, पीछे पीछे कुँवर साहब भी हैं, जो ऑफिस से लेकर दिल तक सब कंट्रोल में रखना चाहते हैं। जब कमला उन्हें रिजेक्ट करती हैं, तो इगो का ऐसा ब्लास्ट होता है कि बंदा सीधे मर्डर मोड में आ जाता है।
बोलने से लाचार सरजू को फंसाया जाता है, कमला खुद अपने पापा की मौत के लिए उसे दोषी मान लेती हैं। कहानी आगे बढ़ती है — जहाँ मंच, माइक और मर्डर सब साथ चलते हैं।
दिल की जगह डायरेक्ट दिल की नसों को छूने वाले गाने
कल्याणजी-आनंदजी का म्यूजिक इस फिल्म का सबसे मज़बूत स्तंभ है।
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“मेरे मितवा मेरे मीत रे” – एक सॉन्ग जो दो वर्जन में आता है और दोनों में दिल पिघला देता है।
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“तेरे नैना क्यों भर आये” – सवाल ही सवाल हैं, जवाब फिल्म में नहीं मिलता।
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“तुझे मजनूं की कसम” – एक 11 मिनट का गीति-नाट्य जो आज के 15-sec reels से कहता है: “सीखो कुछ!”
70s की एक्टिंग जिसमें ड्रामा over और subtlety under
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राजेन्द्र कुमार का भोला चेहरा, लेकिन दुख ऐसा कि दिल बैठ जाए।

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माला सिन्हा – ट्रेजेडी क्वीन का एक और आइकोनिक रूप।
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सुजीत कुमार – “प्यार में पगला गया” वाला archetype, लेकिन यहां वह “प्यार में खतरनाक बन गया” हो जाते हैं।
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सपोर्टिंग कास्ट में कुमकुम, मनमोहन कृष्ण, और डेज़ी ईरानी जैसे नाम भी फिल्म को भावनात्मक गहराई देते हैं।
अगर आपको लगता है कि “Kabir Singh” में obsessive lover दिखाया गया है, तो एक बार “गीत” का कुँवर देखिए – प्यार में रिजेक्ट हुआ, तो गायक की आवाज छीन ली, लड़की के बाप को मार डाला और खुद को बेचारा दिखाया।
और कमला जी? इतनी बार भ्रमित हुईं कि लगता है GPS नहीं, emotional navigation खराब था!
“गीत” 1970 की एक म्यूजिकल ट्रेजेडी है जो उस दौर के क्लासिक बॉलीवुड मसालों का perfect blend है – प्यार, संगीत, ईर्ष्या, और अंत में न्याय।
अगर आपको इमोशनल ओवरडोज, ढेर सारे गाने और 70s की सच्ची फिल्मी दुनिया पसंद है, तो “गीत” जरूर देखिए।
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